Tuesday, 1 December 2015

गीता ज्ञान





“प्रजहाति यदा कमान्सर्वानार्थ मनोगतान” इन पदो का तात्पर्य यह हुआ कि कामना तो आने जाने वाली है और स्वयं निरन्तर रहने वाला है, स्वयं में कामना कैसे हो सकती है, मन एक करण है और उसमें भी कामना निरन्तर नही रहती है, प्रत्युत उसमें आती है अतः मन में भी कामना कैसे हो सकती है ? परन्तु शरीर-इन्द्रियाँ-मन-बुद्दि से तादात्म्य होने के कारण मनुष्य मन में आने वाली कामनाओ को अपने में मान लेता है ।
सन्तोष दो तरह का होता है – एक सन्तोष गुण है और एक सन्तोष स्वरुप है । अन्तः करण में किसी प्रकार की कोई भी इच्छा न हो यह सन्तोष गुण है और स्वयं में असन्तोष का अत्यन्ताभाव है यह सन्तोष स्वरुप है इसलिये कोई अभ्यास या विचार नही करना पड़ता ।

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