जीवन में जब भी मौका मिले गीता जरुर पढ़े । श्रीमदभागवत गीता ऐक विलक्षण ग्रन्थ है इस ग्रन्थ गीता में इतनी विलक्षणता है कि अपना वास्तविक कल्याण चाहने वाले किसी वर्ण, आश्रम, देश, सम्प्रदाय, मत आदि का कोई भी मनुष्य क्यो न हो, इस ग्रन्थ को पढ़ते ही उसमें आकृष्ट हो जाता है अगर मनुष्य इस ग्रन्थ का थोड़ा सा भी पठ्न-पाठन करे तो उसको उद्दार के लिये बहुत ही संतोषजनक उपाय मिलते है हरेक दर्शन के लिये अलग-अलग अधिकार होते है पर गीता की यह विलक्षणता है कि अपना भला चाहने वाले सब-के-सब इसके अधिकारी है । गीता का एक अंश प्रस्तुत है । गतासून – के लिये पिण्ड-पानी देना , श्राद्द-तर्पण करना यह कर्तव्य है और अगतासून के लिये व्यवस्था कर देना निर्वाह का प्रबन्ध कर देना – यह कर्तव्य है । कर्तव्य चिन्ता का विषय नहीं होता, प्रत्युत विचार का विषय होता है । विचार से कर्तव्य का बोध होता है । और चिन्ता से विचार नष्ट होता है ।
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