Thursday, 19 November 2015

गीता ज्ञान

मनुष्य कर्म करने में स्वतन्त्र और फल प्राप्ति में परतन्त्र है । परन्तु अनुकूल-प्रतिकूल रुप से प्राप्त परिस्थिति का सदुपयोग करके मनुष्य उसको अपने उद्दार की साधन सामग्री बना सकता है । क्योकि यह मनुष्य शरीर अपने उद्दार के लिये ही मिला है । मनुष्य को कर्म करना चाहिये और फल की इच्छा कभी ना करे । वो कुदरत या भगवान अपने आप देता है ।

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