कर्म योग की मुख्य बातें – अपने कर्तव्य के द्दारा दूसरे के अधिकार की रक्षा करना कर्मफल का आर्थात अपने अधिकार का त्याग करना । दूसरो के अधिकार की रक्षा करने से पुराना राग मिट जाता है और अपने अधिकार का त्याग करने से नया राग पैदा नही होता, इस प्रकार पुराना राग मिटने से और नया राग पैदा न होने से कर्मयोग वीत राग हो जाता है वीत राग होने पर उसको तत्व ज्ञान हो जाता है कारण कि तत्व ज्ञान की प्राप्ति में नाशवान असत वस्तुओ का राग ही बाधक है ।
दुःखो के संयोग का जिसमें वियोग है, उसका नाम योग है, ये दोनो परिभाषायें वास्तव में एक ही है | दाद की बीमारी में खुजली का सुख होता है और जलन का दुःख होता है, पर ये दोनो ही बीमारी होने से दुःख रुप है, ऐसे ही संसार के सम्बन्ध से होने वाला सुख और दुःख दोनो ही वास्तव में दुःख रुप है । ऐसे संसार से सम्बन्ध विच्छेद का नाम ही ‘दुःख-संयोग-वियोग’ है । अतः चाहे दुःखो के संयोग का वियोग अर्थात सुख-दुःख से सहित होना कहे, चाहे सिद्दि-असिद्दि में अर्थात सुख-दुःख में सम होना कहे, एक ही बात है ।
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