Wednesday, 4 November 2015

गीता ज्ञान

१. स्वधर्म को ही स्वभावज कर्म, सहजकर्म, स्वकर्म आदि नामो से कहा गया है । स्वार्थ, अभिमान और फलेच्छा का त्याग करके दूसरे के हितके लिये कर्म करना स्वधर्म है स्वधर्म का पालन ही कर्म योग है ।

२. धर्म का पालन करने से लोक-परलोक दोनो सुधर जाते है । तात्पर्य है कि कर्तव्य का पालन और अकर्तव्य का त्याग करने से लोक की भी सिद्द हो जाती है और परलोक की भी ।

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