संदेह मनुष्य को अवनति की तरफ ले जाता है संदेह में मनुष्य किसी भी विचार या स्थिति पर अस्पष्ट की स्थिति में होता है । इससे वह मकड़ी के जाल की तरह उलझता चला जाता है और उसके मन की दशा बे तली के लोटे जैसी होती है । संदेह मन के दवारा इतना मनगढ़ंत और काल्पनिक बना देता है कि उसमें सच्चाई बिल्कुल नही होती ऐसा इन्सान छिप-छिप के सच्चाई जनना चाहता है । आमने-सामने बैठकर बात नहीं करना चाहता है । इसलिये जो मनुष्य संदेह करता है और जिस पर संदेह किया जाता है ये दोनो के लिये बड़ा घातक है पति-पत्नी, बाप-बेटे जो भी रिश्ता हो टूट जाते है या जान से मार भी दिये जाते है । संदेह से बचा कैसे जाये ? इससे बचने का ऐक मात्र रास्ता पोसिटिव सोच के साथ जितने लोग इस संदेह में आते है एक कप चाय और समोसो के साथ सभी बैठ कर बात करें । ये पहल संदेह करने वाले को करनी चाहिये । ९०% तक संदेह करने वाले झूठे साबित होते है । और १०% में सच होते है । धनात्मक सोच के साथ इसे सुलझाया जा सकता है ।
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