Friday, 6 November 2015

संगत

किसी भी मनुष्य की अगर संगत या माहोल ठीक नही है तो उसे परेशानियो का सामना करना पड़ सकता है । तुलसीदास ने रामायण में कहा है कि “दुष्ट संगत नही देय विधाता, जाते भलो नरक को वासा” इसका अर्थ है कि भगवान दुष्ट और कुकर्मी का साथ न दे भले ही नरक में स्थाई जगह दे दें । दुष्ट का संग कितना खतरनाक होता है इस दोहे से स्पष्ट हो जाता है । संगत का असर जरुर पड़ता है जैसे एक बालक जो पढ़ाई में कमजोर है लेकिन इसके दोस्त बुद्दिमान है यानी संगत पढ़ने लिखने वाले बालक है तो कमजोर होते हुए भी यह बालक अपना काम निकाल ले जायेगा । इसके विपरीत दूसरा बालक जो पढाई लिखाई में तेज है लेकिन उसका साथ झगड़ालू व चोरी-चपाटी वाले बच्चो के साथ है । यह बालक चाहते हुए भी नहीं पढ़ सकता क्योकि बालक मन बड़ा ही चंचल और कोमल स्वभाव का होता है । ऐसे में यह बालक वैसी ही आदते सीखेगा जैसे बालको के साथ रहता है । और पढ़ाई में तेज होते हुए भी ये असफल हो जयेगा । क्योकि संगत खराब है । अगर योवन में १३-१७ साल के उम्र में अगर बालक को सही दिशा निर्देश मिले तो १७ के बाद में इतनी समस्या नहीं होगी लेकिन थोड़ा ध्यान रखना पड़ेगा । ये बालक और बालिकाओ दोने के लिये है । १७ वर्ष के बाद बालक और बालिकाओ के साथ दोस्त या भाई-बहन जैसे रहे और बच्चो से हर बात शेयर करे । उनके दोस्तो के बारे में बात करे और पढ़ाई, खेल, पिकनिक और घर की छोटी बड़ी समस्याओ के बारे में बच्चो की भी राय ले । उन पर छोटी- छोटी जिम्मेदारी भी डाले बाहर के काम भी दें फीस भी उनसे जमा करवाये । जब बच्चा अपने स्कूल या कोलेज की हर छोटी बड़ी बात आपको बताने लगे तो समझो वो आपका दोस्त बन चुका है अब आपके बच्चे को कोई नहीं बिगाड़ सकता है । इन सबके साथ बच्चो की संगत का जरुर ध्यान रखे । बचपन से ही अच्छी आदते और संस्कार डाले ।

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